आखिरी जेठ के इस मौसम में हर
जगह उमस की चादर लिए एक दुसरे से बिलकुल जुदा जब दिन और रात भी एक हो लिए हैं | वहीँ
अपने कमरे में निपट अकेला एक लड़का अपने मन की गहराइयों में जाकर उसके अन्दर उपजे
अकेलेपन को किसी से बाँट आने की आरज़ू मिन्नतें करता है | पर उसका मन तैयार भी कैसे
हो ! डरता है वह लड़का | डरता है वो लड़का उसकी ओर मुस्कुराते चेहरों के पीछे छुपी कुटिलता
के अहसास से, गर्मजोशी से मिलते हाथों के पीछे छुपी झूठी औपचारिकता से, नए परिचय
के कुछ नकली लोगों की मतलबियत से | धीरे-धीरे सब समझने लगा है वो |
अपनी छोटी सी उम्र में अपने
अन्दर तरह-तरह के खट्टे-मीठे अनुभवों को समेटे उस लड़के का मन धीरे-धीरे थककर अब
बहुत डरने लगा है | धीरे-धीरे बड़ा होता उसका शहर, लोगों की बढती भीड़, ऊंचे ओवरब्रिजेज,
नए खुलते शौपिंग माल्स उसे उत्साहित नहीं करते, बल्कि डराते हैं | सड़क पर वो लड़का
नए-नए चेहरों का मुंह ताकता हुआ चलता है, और अपने मन में उन लोगों के घर से बाहर
निकलने के उद्देश्य के बारे में सोचता है | हाँ ये अजीब है | और, ऐसे चेहरों को
देखकर उसे अक्सर सिटीलाइट्स मूवी के अरिजीत के गाये गाने की आवाजें पार्श्व संगीत
के जैसे अंतर्मन में निरंतर सुनाये देते रहती है- “इतने सारे चेहरे हैं और तनहा सब
के सब, तेरे शहर का काम है चलना, यूँ ही बेमतलब” | फिर वो दफ्तर जाते वक़्त पुतले
जैसे लोगों और गाड़ियों से ठस चुकी मेन सड़क का रास्ता छोड़ औरों से अलग एक सुनसान
गली पकड़ लेता है | उस गली में उसे मिलते हैं कान्हा जी, देवी माँ और बजरंगबली भी
तो | तीन मंदिर हैं वहां | वहीँ रोज़ की तरह उसे मंदिर के बगल में नज़रें झुका कर
अपने काम में मग्न बादाम मिलाकर भांग पीस रहा दुकानदार मिलता है | और मिलते हैं
कुछ लोग, जो दुनिया जहान के पचड़ों से दूर रोज़ वहीँ पीपल के पेड़ के नीचे गोल चबूतरे
पर ताश खेलते दिख जाते हैं | थोडा ही आगे पोखर के किनारे एक महादलित टोला भी मिलता
है, जिसे देखकर लगता है कि इनकी सुबह ही अभी हुयी है | या सुबह हुयी ही नहीं इनकी
कभी ........| और उसी पोखर के किनारे एक
छोर पर फूस से बनी एक झोपडी मिलती है | वहीँ उसे लगभग रोज़ ही दिख जाती है उसी
झोपडी में रहने वाली बैसाखियों के सहारे चलती एक बहुत ही खूबसूरत लड़की | लगभग हर
रोज़ नज़रें मिलती हैं दोनों की, पर हर बार अजनबियों की तरह ही | इस तरह चलते-चलते धीरे-धीरे
वो पहुँच जाता है उस जगह जहां उसके पगलाए मन को कुछ घंटों के लिए आराम मिल जाता है
| उसका दफ्तर |
लड़के की शामें भी और दूसरे
हमउम्र लड़कों की तरह मलंगी नहीं है | एकाकी जीने की आदत हो गयी है उसे | पर ऐसा
हमेशा से नहीं था | जीन जैसा भी कुछ होता है ना शायद ! उसके पिता भी शामों को सबसे
अलग बाहर अँधेरे में बिलकुल चुपचाप रेडियो सुना करते थे | लड़के को अजीब लगता था, पर
वो कुछ बोलता नहीं था |
लड़का बुरा नहीं है, बस उसे
समाज के सो कॉल्ड सोफेस्टीकेटेड पीपल के बीच ठीक से घुलना मिलना नहीं आता | बुरे वक़्त
ने उसके आत्मविश्वास को डिगा के रख दिया है | बुरा वक़्त उसका पीछा छोड़ता ही नहीं
है ...... ठीक वैसे जैसे कुत्तों का कोई झुण्ड, बोरा लिए कूड़ा बीनने वाले
छोटे-छोटे बच्चों का पीछा नहीं छोड़ता | लगभग काट खाने की स्थिति में पीछे-पीछे
भौंकते चलता है |
पर कोई ना......... लड़के का
दिल भी बहुत जिद्दी है | J