विधानसभा चुनावों का सीजन
है | जम्मू कश्मीर और झारखण्ड में सभी चरणों में चुनाव समाप्त हो चुके हैं | चुनावों के परिणाम कल आने हैं | बिहार
के बहुप्रतीक्षित चुनाव में अभी कुछ समय बाकी है | जम्मू कश्मीर और झारखंड में हो
चुके चुनावों के परिणामों का इंतज़ार तमाम राजनीतिक दिग्गज खासकर भाजपा के नेतागण
ठीक स्कूल के उन टौपर बच्चों की तरह कर रहे हैं जो अपने आने वाले रिजल्ट के अच्छे परिणामों
को लेकर आशान्वित होते हैं | मोदी लहर का तो पता नहीं पर दिसम्बर के इस सर्द महीने
में समूचा उत्तर भारत शीत लहर की चपेट में है, लेकिन देश का राजनीतिक माहौल खासकर
विधानसभा चुनावों वाले राज्यों जैसे झारखण्ड और बिहार में इस वक़्त काफी गरम है | तमाम
राजनीतिक दलों और संगठनों के बड़े नेताओं से लेकर चिरकुट नेता (छुटभैया नेता) आपको
पार्टी कार्यालय में राजनीतिक बहसबाजी करते मिल जायेंगे | कुछ भी हो केंद्र में
भाजपा की सरकार बनने के बाद राज्यों में हो रहे या हो चुके विधानसभा चुनावों में
भाजपा का पलड़ा थोडा भारी ही है | महाराष्ट्र विधानसभा और हरियाणा विधान सभा चुनाव के
नतीजे इसके ताज़ा उदाहरण हैं | हो भी क्यों ना मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता
पार्टी की केंद्र में बन चुकी बहुमत वाली सरकार ने राज्यों में मृतप्राय भाजपा
संगठनों में प्राण फूँक दिए हैं | राज्यों में लम्बे समय से क्षेत्रीय पार्टियों
के वर्चस्व को देखते हुए राज्यों में भाजपा की सफलता कुछ सोचने पर मजबूर करती है |
क्या इन राज्यों के लोग क्षेत्रीय पार्टियों द्वारा किये गए वायदों और आश्वासनों तथा
परिवारवाद की राजनीती से उकता गए हैं या फिर देश की राजनीती एक नयी ऐतिहासिक दिशा
में जा रही है, जिसके गवाह इस पीढ़ी के हम सभी लोग होंगे | बहुत दूर ले के चले गए
आपको, थोडा नीचे आ जाइए, बिहार की वर्तमान राजनीती पर कुछ प्रकाश डालते हैं |
कभी एक दुसरे के धुर
विरोधी रहे नितीश और लालू लोकसभा चुनाव में चोट खाकर अब एक हो चुके हैं | सिर्फ नितीश
की जदयु और लालू की आरजेडी ही नहीं कई क्षेत्रीय दल एकजुट हो चुके हैं, एचडी
देवेगौडा भी हैं साथ में और इनके अगुआ हैं मुलायम सिंह यादव | मोदीजी ने सच ही कहा
था गठबंधन कर के दिल्ली में सरकार बनायीं जाती है, लेकिन अब विपक्ष के लिए पार्टियों
को गठबन्धन करना पड़ेगा | बात सही साबित हुयी | आज दिल्ली के जंतर मंतर पर जनता
परिवार का विशाल महाधरना हुआ है | सारे दिग्गज जुटे हैं लालू यादव, नितीश कुमार, शरद
यादव, मुलायम सिंह यादव, एचडी देवेगौडा | वो कहते हैं न अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता,
भाड़ फोड़ने के लिए चने जुड़ रहे हैं | मुद्दे से फिर भटक गए हैं, आइये फिर से बिहार
पर आते हैं |
लोकसभा चुनाव में नितीश
कुमार की हार पर बिहार के लोग कहते पाए जाते हैं की इन्होने सिर्फ अति पिछड़ों और
महादलितों की राजनीती की हैं, और यही इनकी हार का प्रमुख कारण बना हैं | क्या सच
में जातिवाद बिहार की राजनीती पर हावी है ? क्या यहाँ के लोग इस बार के विधानसभा चुनाव
में इससे ऊपर उठकर वोट देंगे ? तो जवाब है, नहीं | यहाँ की राजनीती में अभी बहुत
वक़्त है | ऐसा नहीं की सिर्फ सुशासन बाबू (नितीश कुमार) और सेकुलर बाबू (लालू
यादव) ही जातिवाद की राजनीती करते हैं, भाजपा ने भी लोकसभा चुनावों में इसका फायदा
उठाया है | अगर ऐसा नहीं होता तो पासवानजी की लोजपा को भाजपा गठबंधन में शामिल
नहीं किया जाता | बहुत ही स्पष्ट है की चुनावों में जीत के कई पैंतरें हैं और
जातिवाद की राजनीति पहले नंबर पर है | पर क्या जातिवाद की राजनीती पर ही चुनाव जीते
जाते हैं ? राष्ट्रीय परिदृश्य पर देखें और लोकसभा चुनावों में भाजपा की जीत का
अवलोकन करें तो पायेंगे की भाजपा की जीत के कई फैक्टर हैं उनमे प्रमुख हैं जनमत बनाने
में सोशल मीडिया की भूमिका, संगठन शक्ति और अच्छे प्रवक्ताओं की फौज | जेडीयू और
आरजेडी के पास इनकी घोर कमी है | ऐसा नहीं है नितीश ने बिहार में काम नहीं किया है
| लेकिन उनके किये कामों को नारों में बदलने के लिए एक कुशल टीम की आवश्यकता है जो
की फिलवक्त जेडीयू के पास नहीं हैं | सच बात यही है की नितीश अपने सुशासन को नहीं
बेच पा रहे हैं, क्योंकि कहाँ हैं वो बड़े बड़े होर्डिंग जो की नितीश के सुशासन के
दावों को सच साबित करें | और नितीश अभी तक सिर्फ फेसबुक पर ही अपने “मन की बात” कहते आये हैं, उनका अभी ट्विटर, इन्स्टाग्राम जैसे सोशल
साइट्स पर आना बाकी हैं |
ऐसे में नए साल में होने
वाले बिहार विधान सभा चुनावों में भाजपा की सरकार बनेगी या महागठबंधन की ये तो आने
वाले समय में पता चल ही जायेगा, दोनों के बीच कड़ी टक्कर होनी है| महागठबंधन तथा
भाजपा के समर्थक दोनों अपने अपने जीत के दावे कर रहे हैं | ऐसे में सिर्फ यही कहेंगे
की कम से कम बिहार की राजनीती में अंदाज़े लगाने बंद कर दीजिये, क्योंकि पिक्चर अभी
बाकी है मेरे दोस्त |

