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Monday, 22 December 2014

बिहार विधानसभा चुनाव में अबकी बार किसकी सरकार ?

      विधानसभा चुनावों का सीजन है | जम्मू कश्मीर और झारखण्ड में सभी चरणों में चुनाव समाप्त हो चुके हैं | चुनावों के परिणाम कल आने हैं | बिहार के बहुप्रतीक्षित चुनाव में अभी कुछ समय बाकी है | जम्मू कश्मीर और झारखंड में हो चुके चुनावों के परिणामों का इंतज़ार तमाम राजनीतिक दिग्गज खासकर भाजपा के नेतागण ठीक स्कूल के उन टौपर बच्चों की तरह कर रहे हैं जो अपने आने वाले रिजल्ट के अच्छे परिणामों को लेकर आशान्वित होते हैं | मोदी लहर का तो पता नहीं पर दिसम्बर के इस सर्द महीने में समूचा उत्तर भारत शीत लहर की चपेट में है, लेकिन देश का राजनीतिक माहौल खासकर विधानसभा चुनावों वाले राज्यों जैसे झारखण्ड और बिहार में इस वक़्त काफी गरम है | तमाम राजनीतिक दलों और संगठनों के बड़े नेताओं से लेकर चिरकुट नेता (छुटभैया नेता) आपको पार्टी कार्यालय में राजनीतिक बहसबाजी करते मिल जायेंगे | कुछ भी हो केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद राज्यों में हो रहे या हो चुके विधानसभा चुनावों में भाजपा का पलड़ा थोडा भारी ही है | महाराष्ट्र विधानसभा और हरियाणा विधान सभा चुनाव के नतीजे इसके ताज़ा उदाहरण हैं | हो भी क्यों ना मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की केंद्र में बन चुकी बहुमत वाली सरकार ने राज्यों में मृतप्राय भाजपा संगठनों में प्राण फूँक दिए हैं | राज्यों में लम्बे समय से क्षेत्रीय पार्टियों के वर्चस्व को देखते हुए राज्यों में भाजपा की सफलता कुछ सोचने पर मजबूर करती है | क्या इन राज्यों के लोग क्षेत्रीय पार्टियों द्वारा किये गए वायदों और आश्वासनों तथा परिवारवाद की राजनीती से उकता गए हैं या फिर देश की राजनीती एक नयी ऐतिहासिक दिशा में जा रही है, जिसके गवाह इस पीढ़ी के हम सभी लोग होंगे | बहुत दूर ले के चले गए आपको, थोडा नीचे आ जाइए, बिहार की वर्तमान राजनीती पर कुछ प्रकाश डालते हैं |


     
कभी एक दुसरे के धुर विरोधी रहे नितीश और लालू लोकसभा चुनाव में चोट खाकर अब एक हो चुके हैं | सिर्फ नितीश की जदयु और लालू की आरजेडी ही नहीं कई क्षेत्रीय दल एकजुट हो चुके हैं, एचडी देवेगौडा भी हैं साथ में और इनके अगुआ हैं मुलायम सिंह यादव | मोदीजी ने सच ही कहा था गठबंधन कर के दिल्ली में सरकार बनायीं जाती है, लेकिन अब विपक्ष के लिए पार्टियों को गठबन्धन करना पड़ेगा | बात सही साबित हुयी | आज दिल्ली के जंतर मंतर पर जनता परिवार का विशाल महाधरना हुआ है | सारे दिग्गज जुटे हैं लालू यादव, नितीश कुमार, शरद यादव, मुलायम सिंह यादव, एचडी देवेगौडा | वो कहते हैं न अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता, भाड़ फोड़ने के लिए चने जुड़ रहे हैं | मुद्दे से फिर भटक गए हैं, आइये फिर से बिहार पर आते हैं |


      लोकसभा चुनाव में नितीश कुमार की हार पर बिहार के लोग कहते पाए जाते हैं की इन्होने सिर्फ अति पिछड़ों और महादलितों की राजनीती की हैं, और यही इनकी हार का प्रमुख कारण बना हैं | क्या सच में जातिवाद बिहार की राजनीती पर हावी है ? क्या यहाँ के लोग इस बार के विधानसभा चुनाव में इससे ऊपर उठकर वोट देंगे ? तो जवाब है, नहीं | यहाँ की राजनीती में अभी बहुत वक़्त है | ऐसा नहीं की सिर्फ सुशासन बाबू (नितीश कुमार) और सेकुलर बाबू (लालू यादव) ही जातिवाद की राजनीती करते हैं, भाजपा ने भी लोकसभा चुनावों में इसका फायदा उठाया है | अगर ऐसा नहीं होता तो पासवानजी की लोजपा को भाजपा गठबंधन में शामिल नहीं किया जाता | बहुत ही स्पष्ट है की चुनावों में जीत के कई पैंतरें हैं और जातिवाद की राजनीति पहले नंबर पर है | पर क्या जातिवाद की राजनीती पर ही चुनाव जीते जाते हैं ? राष्ट्रीय परिदृश्य पर देखें और लोकसभा चुनावों में भाजपा की जीत का अवलोकन करें तो पायेंगे की भाजपा की जीत के कई फैक्टर हैं उनमे प्रमुख हैं जनमत बनाने में सोशल मीडिया की भूमिका, संगठन शक्ति और अच्छे प्रवक्ताओं की फौज | जेडीयू और आरजेडी के पास इनकी घोर कमी है | ऐसा नहीं है नितीश ने बिहार में काम नहीं किया है | लेकिन उनके किये कामों को नारों में बदलने के लिए एक कुशल टीम की आवश्यकता है जो की फिलवक्त जेडीयू के पास नहीं हैं | सच बात यही है की नितीश अपने सुशासन को नहीं बेच पा रहे हैं, क्योंकि कहाँ हैं वो बड़े बड़े होर्डिंग जो की नितीश के सुशासन के दावों को सच साबित करें | और नितीश अभी तक सिर्फ फेसबुक पर ही अपने मन की बात कहते आये हैं, उनका अभी ट्विटर, इन्स्टाग्राम जैसे सोशल साइट्स पर आना बाकी हैं |
      ऐसे में नए साल में होने वाले बिहार विधान सभा चुनावों में भाजपा की सरकार बनेगी या महागठबंधन की ये तो आने वाले समय में पता चल ही जायेगा, दोनों के बीच कड़ी टक्कर होनी है| महागठबंधन तथा भाजपा के समर्थक दोनों अपने अपने जीत के दावे कर रहे हैं | ऐसे में सिर्फ यही कहेंगे की कम से कम बिहार की राजनीती में अंदाज़े लगाने बंद कर दीजिये, क्योंकि पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त |

      

Friday, 5 December 2014

एक्शन जैक्सन

टाइटल पढ़ के कन्फुजियाएगा मत, फिल्म की समीक्षा नहीं कर रहे हैं | आइये फिल्म को छोड़कर रियल लाइफ के एक्शन की बात करते हैं | इन दिनों हरियाणा के रोहतक की दो बहनें अपने एक्शन के लिए काफी चर्चा में हैं | कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर इन दोनों बहनों का बस में दो लड़कों की सिंघम स्टाइल में बेल्ट से पिटाई का विडियो बहुत चर्चित हुआ | विडियो इतना ज्यादा वायरल हुआ की मीडिया में आ गया, बस फिर क्या था हमारे देश के महान मीडिया ने इस खबर को ब्रेकिंग न्यूज़ बना दिया और दोनों बहनों को मर्दानी | सभी चैनलों पर ये खबर इतना चला की हरियाणा सरकार ने इन बहनों की बहादुरी को देखते हुए आगामी 26 जनवरी के समारोह में 31000 रुपये से पुरस्कृत करने का ऐलान कर दिया, और बस के ड्राईवर और कंडक्टर को सस्पेंड कर दिया | ज्यादा समय नहीं गुज़रा था की तभी इन दोनों बहनों का एक और विडियो सामने आ गया, इसमें भी दोनों बहनें किसी लड़के को पीटने की महती कृपा कर रहीं थी | कहानी में ट्विस्ट तब आया जब बस में बैठे चश्मदीद गवाह लोग लड़कियों का पक्ष न लेकर लड़कों का पक्ष लेने लगे और कहने लगे की बस में गलती लड़कों की नहीं थी, बल्कि लड़कियों की थी | लड़के तो किसी बूढी औरत का टिकेट लेकर उन बूढी औरत को बस में बिठाए थे | और इन दोनों लड़कियों को बस में खराब सीट मिली थी, ये लडकियां उन कथित बूढी औरत को हटने को बोल रही थी, कह रही थी की ये सीट हमारी है, बस लड़के इसी का विरोध करने लगे थे | फिर भी बूढी औरत झगडा नहीं चाहती थी, तो वो बस में पड़े एक टायर के ऊपर बैठ गयी, अब उन दो लड़कियों में से एक लड़की इन दो लड़कों में से एक लड़के को अपने सीट में से उठने के लिए बोली, बस तभी झगडा शुरु हुआ |
     पिटने वाले दोनों लड़कों का आर्मी में सिलेक्शन हो चूका था, सिर्फ जॉइनिंग बाकी थी, सरकार ने इन दोनों लड़कों के आर्मी में नियुक्ति पर फिलवक्त रोक लगा दिया है | अब मीडिया ने पलटी मारी है, और दोनों बहनों और लड़कों को सामने लाकर 1 घंटे का स्पेशल एपिसोड चला रही है | इससे क्या होगा, अब लड़कों और लड़कियों ने ‘किनले मिनरल वाटर’ तो पिया नहीं है, जिसकी बूँद-बूँद में सच्चाई है, और सच का पता चल जायेगा | मीडिया को किसी भी खबर को एकतरफा दिखाने से पहले ठीक से पड़ताल कर लेनी चाहिए |

    लडकियों को कहीं भी छेड़ना या फब्तियां कसना निश्चय ही अपराध है | सभ्य समाज में कतई स्वीकार्य नहीं है | बस कहना ये है की इस घटना की अच्छे से जांच हो, सच्चाई सामने आये और किसी निरपराध को इसकी सजा न मिले |
     ठीक है चलते हैं, रविश सर की तरह नहीं कहेंगे की आप भी चलते रहिये | बल्कि कहेंगे की चलिए, फिरिए, दौडिए, खेलिए-कूदिये, गाइए-नाचिये, and do whatever you want to do man, बस किसी लड़की को छेडिएगा मत | :D

Wednesday, 25 June 2014

परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है |

      लोग कितनी तेज़ी से बदल जाते हैं न, पर शहर इतनी तेज़ी से नहीं बदलता | महानगरों की बात नहीं कर रहे | गाँव और कस्बेनुमा शहरों के बदलने की रफ़्तार थोड़ी आहिस्ता ही होती है | जब लोग बरसों बाद भी महानगरों से अपने छोटे से शहर में, कस्बों में, गाँव में वापस आते हैं जहां उनका बचपन बीता था, वे बड़े हुए थे तो वे पाते हैं की कुछ भी तो नहीं बदला | न उनका वो पुराना दो कमरे का स्कूल बदला, न ही अस्पताल बदले, न सड़कें बदली और न ही बाज़ार बदले | अब भी घर के पास वाले छोटे से मैदान पर कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं | घर के पास में पड़ोस वाले चाचा 3जी युग में भी रेडियो पर हेल्लो फरमाइश सुन रहे हैं | आस-पड़ोस की चाचियाँ अपने घरों के बाहर वाले दीवारों पर गोयठा ठोक रही हैं और पास वाली गली में अब भी वही बूढा पुरानी बोतलों और रद्दियों के बदले सोन पापड़ी के लिए आवाजें दे रहा है, और तो और माँ के संदूक का ताला भी अब तक वही पुराना वाला ही है | क्या अब भी सब कुछ वैसा ही है जैसा वो छोड़कर गए थे, या किसी ने टाइम मशीन से उन्हें पुराने वक़्त में लाकर खड़ा कर दिया है | शहर वैसा का वैसा क्यों है ? शायद वक़्त ठहर गया होगा, या फिर शहरों में हमने बहुत ऊंची उड़ान भर ली है, जहां से पीछे मुड़ कर देखो तो ये सब आउटडेटेड सा लगता है | दरअसल हम अपने सार्वजनिक जीवन में कुछ ऐसे रम जाते हैं की वक़्त का पता ही नहीं चलता | दिन......... महीने ....... साल | और ऐसे में एक युग ही बदल जाता है पर छोटे शहरों में सब कुछ वैसे का वैसा पड़ा मिलता है |


बचपन में हमने किताबों में पढ़ा भी था की “परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है” | पर परिवर्तन और विकास की ये भिन्न चाल हमें और समाज को कुछ सोचने पर मजबूर करती है | अब ज़रा आगे नज़र डालिए | महानगरों में और ऊंची होती बिल्डिंगे, और छोटे शहरों में टूटती स्कूल की छतें | महानगरों में बनते नए-नए फ्लाईओवर और छोटे शहरों में टूटी हुयी सड़कें | महानगरों में बनते नित नए नए स्विमिंग पूल और छोटे शहरों में टूटे हुए छठ पूजा के घाट | महानगरों के कान्वेंट स्कूलों में प्रोजेक्टर और नोटपैड पर होती पढाई और गाँव में भवनहीन स्कूलों में पीपल/ बरगद के पेड़ के नीचे लगती कक्षा | बात छोटे शहरों को मेट्रो का दर्जा दिलाने की नहीं है, बल्कि इन गाँव और छोटे शहरों की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने की है, तभी इन शहरों में रहने वाले बच्चों और युवाओं को एक बेहतर महौल मिलेगा और ये अपनी प्रतिभा अनुरूप देश को आगे ले जा सकेंगे | हमारे देश के राजनेताओं को यह सोचना होगा की कैसे देश के विकास में एकरूपता लाया जाये जिससे इन बच्चों और युवाओं की प्रतिभा कुंठित न होने पाए, बात अच्छे दिनों को लाने की जो है |

Thursday, 8 May 2014

ये है मुंबई मेरी जान

         मुंबई ! सपनों का शहर | हा हाहा | थोडा ललित निबंध टाइप हो गया न ? पर सच है रोजाना हजारों-लाखों लोग कुछ बनने का ख्वाब लेकर यहाँ आते हैं | सपने दिखाती है ये शहर, कुछ के पूरे करती है, और कुछ इन सपनों में ही समा जाते हैं | मुंबई की लाइफलाइन कहते है यहाँ के लोकल ट्रेन को | मुंबई की लोकल में रोजाना बहुत ही ज्यादा भीड़ होती है, राजनीतिक शब्द में कहना चाहें तो अपार जनसैलाब कह सकते हैं | स्टेशन पर आप कहीं रूककर ज़रा लोगों को देखिये तो दिखता है की लोग कान में ठिप्पी (ईयर फ़ोन) लगाए पागलों की तरह उन्माद में भागते नज़र आते हैं | पर इसी बीच यह अहसास होता है की हम क्यों रुक कर लोगों को देख रहे हैं यहाँ पर | लोगों के भागते होने के बीच खुद का रुकना जो आत्मबोध कराता है वो रोंगटे खड़े कर देने वाला होता है | ऐसा लगता की कोई रेस चल रही हो और अगर हम कुछ देर रुके तो कहीं पीछे छूट जायेंगे | पर एक बात ज़रूर है की कन्धों पर बैग लटकाए और कान में इयर फ़ोन लगाए इन लोगों को जीवटता को सलाम करने का दिल भी करता है की कैसे ये कर पाते हैं ? रोज़ वही भागकर लोकल पकड़ना, पसीने से नहाए खड़े-खड़े सफ़र करना, खड़े-खड़े ही झपकी मार लेना, सुबह घर से जल्दी निकलना, और देर से लौटना, और मुंबई के ट्रैफिक और शोर में जीना | पर इस आपाधापी से दूर मुंबई में कई ऐसी जगहें हैं जो आपके मन को मोह लेती हैं जैसे जुहू बीच, मरीन ड्राइव और गेट वे औफ इंडिया |
       मुंबई की पागल करती भीड़, ट्रैफिक जाम से दूर जब आप गेट वे ऑफ़ इंडिया के पास आते हैं जिसके बिलकुल सामने होटल ताज है तो इनको देखते ही मन एकाएक खिल उठता है, ठीक वैसे ही जैसे रूसे हुए बच्चे  को किसी ने उसके मनपसंद का खिलौना दे दिया हो | गेट वे ऑफ़ इंडिया के आस पास लहराता हुआ समंदर उस माँ की तरह लगने लगता है जो कहीं दूर बैठी अपनी यादों में अब भी हमारा माथा सहला रही है | हौले हौले | प्यार से | समंदर से उठती ठंढी सी हवाएं माँ की उन मासूम थपकियों सी लगती हैं, जो न जाने कब से नसीब नहीं हुयी | जो दूरियों में कहीं गुम हो गयी |


       अथाह सा समंदर उतावले से शहर को अपनी लहरों के बीच कहीं गुम कर देता है जैसे भागते हुए किसी शैतान से बच्चे को माँ ने पकड़कर अपनी आँचल में छुपा लिया हो |



और इस तरह आप चाहे अनचाहे मुंबई से प्यार करने लगते हैं |

Friday, 14 March 2014

गाड़ी बुला रही है सीटी बजा रही है, चलना ही जिंदगी है चलती ही जा रही है |

बात इसी सोमवार की है | पंचायती राज विभाग के ई पंचायत मिशन मोड प्रोजेक्ट के तहत नेशनल पंचायत पोर्टल और लोकल गवर्नमेंट डायरेक्टरी के एप्लीकेशन का प्रशिक्षण लेने हेतु पटना जाना था | ट्रेन रात को सवा ग्यारह बजे थी, इसलिए दस पैंतालिस में ही बेगुसराय स्टेशन पर आ गया | टिकट कटाकर प्लेटफार्म पर आ गया | प्लेटफार्म पर इक्के दुक्के लोग ही थे, कुछ सोये हुए थे, और कुछ मेरी तरह इधर उधर टहल रहे थे | टहलते टहलते मैं रेलवे आहार खान- पान सेवा के स्टाल वाले से पानी का बोतल खरीदकर पास वाली बेंच पर आकर बैठ गया | रेलवे आहार के स्टाल वाला व्यक्ति एक बच्चे से बड़ी देर से बात कर रहा था, चूंकि रात के 11 बज गए थे, इसलिए किसी ग्राहक के आने की उम्मीद नहीं थी | स्टाल वाला बड़ी इत्मीनान से बच्चे से बातें कर रहा था | बच्चे की उम्र कोई 9-10 साल की होगी | मैले कुचैले कपडे पहने और पैंट को नीचे से घुटनों तक फोल्ड किये हुए वह लड़का ट्रेनों में घूम-घूम कर दालमोट (नमकीन) बेचा करता था | मेरे अगल बगल कोई था नहीं तो उस स्टाल वाले और उस बच्चे की बातें सुनने लगा | बच्चा अपनी छोटी से उम्र के कड़वे अनुभव बता रहा था | बता रहा था की उसके पिता ने उसकी मां और उसको छोड़ दिया है | ट्रेनों में घूम घूमकर वह दालमोट बेचकर अपनी और अपनी मां का गुज़ारा करता है | वह रात को किसी प्लेटफार्म पर ही सो जाया करता है | अभी दो दिन से उसकी मां को बुखार है, दवा देने से मां का बुखार ठीक नहीं हुआ है तो उसने इंजेक्शन दिलवाया है | स्टाल वाले के पूछने पर बच्चे ने बताया की उसने आज कुछ नहीं खाया है | इस बच्चे की पहाड़ सी समस्याओं को सुनकर एक बात याद आई जो कहीं सुना था की “जिसका कोई नहीं होता है उसका भगवान् होता है” | सोचने लगा की भगवान् भी क्यों इतनी परीक्षा ले रहे हैं इसकी, छोटा बच्चा तो है वो | जब उसने स्टाल वाले को अपनी टूटी हुयी भाषा में कहा की भैया मेरा घर उजड़ गया है ये सुनकर मेरी आँख पूरी गीली हो गयी, फिर भी अपनी आँख झुकाकर उसकी बातें सुन रहा था | सोचने लगा की कहाँ गए बाल श्रम उन्मूलन का पहाड़ा पढ़ने वाले लोग, आओ और इसकी मदद करो | अब इसकी बात सुनी नहीं जा रही थी, ये रात सच में किसी काली रात की तरह लगने लगी थी, ऐसा लग रहा था की मिथकों से कोई दानव निकल कर तमाम कमजोरों को रगेद रहा हो |

इतने में अनाउंसमेंट हुयी की न्यू जलपाईगुडी से चलकर दानापुर तक को जाने वाली कैपिटल एक्सप्रेस प्लेटफार्म क्रमांक संख्या 01 पर आ रही है | ट्रेन आई और मैं चढ़ गया, चढ़ कर पलट कर देखा तो बच्चा अपने मैले कुचैले से गमछे में दालमोट के पैकेटों को समेट रहा है | 

Friday, 24 January 2014

वर्तमान राजनीति और आम आदमी

रोज़ शाम और देर रात को जब हम टीवी पर प्रमुखता से छाए हुए आम आदमी की ख़बरें देखते हैं और तमाम चैनलों पर विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों की गला फाड़ बहस देखते हैं तो यह सोचने लगते हैं की क्या दिल्ली विधानसभा चुनाव के कुछ दिन पहले तक इन प्रतिनिधियों को आम आदमी की इतनी चिंता थी ? तमाम चैनल अपनी रिपोर्ट में बता रहे हैं कि आम आदमी पार्टी की सफलता के बाद कई राजनीतिक दलों के नेताओं ने महंगी गाड़ियों से सफ़र करना छोड़ दिया है, कई मंत्रियों ने लाल बत्ती लगाना छोड़ दिया है, उनकी गाड़ियों का काफिला भी छोटा हो चला है | क्या राजनीतिक परिदृश्य वाकई में बदल गया है या फिर आम आदमी पार्टी की अब तक की सफलता को देखते हुये कांग्रेस और बीजेपी ने अपनी राजनीती की धारा को थोडा अलग दिशा में मोड़ लिया है | पर यह तो तय है भैया की ये दल थोड़ी सादगी से रहने लगे हैं, और अब उनके भाषणों में आम आदमी और उनकी समस्याएं आने लगी हैं | जी सही सोच रहे हैं आप, पहले नहीं के बराबर इनका ज़िक्र आता था, विभिन्न दलों के नेता सिर्फ अपनी सरकार के कारनामे बताते थे, की हमें नरेगा दिया, हमने आरटीआई दिया, हमने महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया, हमने लैपटॉप दिया, हमने चाय बेची वगैरह वगैरह | पर आम जनता की मूलभूत अवश्यकताओ का क्या ? आम जनता गयी तेल लेने | आजकल टीवी पर कांग्रेस पार्टी का एक ऐड आ रहा है, शायद आप सबने देखा होगा, की एक व्यक्ति सो रहा है, और सपने में वो फ्लाईओवर, एटीएम, बैंक, एअरपोर्ट, मेट्रो वगैरह देखता है, जब जागता है, तब अपनी पत्नी से कहता है, की इस सरकार ने हमें 10 सालों में कितना कुछ दिया | आप ही बताईये की कुछ मेट्रो शहर को छोड़कर बाकी शहरों में कहाँ हैं मेट्रो, फ्लाईओवर और एअरपोर्ट | आप दिल पर हाथ रख कर सोचिये की बेरोज़गारी हटाने के लिए, देश की गरीब जनता की दाल रोटी के लिए क्या किया इस पार्टी ने ? कांग्रेस कहती है की भारत एक सुपरपॉवर देश बनने की ओर अग्रसर है | नहीं बनना हमें ऐसा सुपरपॉवर देश जहां देश की आधी गरीब जनता एक वक़्त की रोटी खाती है, और दुसरे वक़्त खाने के लिए सोचती है, और दूसरी तरफ इनके नेता के अरबों के वारे न्यारे हो रहे हैं | सलमान खान का एक गाना आजकल आ रहा है, “अपना काम बनता भाड़ में जाए जनता” | क्या सही लाइन है इसकी | क्या वाकई कांग्रेस इस ऐड वाले व्यक्ति की तरह सपने देख रहा है की तीसरी बार भी इसकी सरकार बन जाएगी ? इतना आसान नहीं है, देश बदलाव से गुज़र रहा है, आम आदमी अपने अधिकारों को लेकर सचेत है, दृढ है | देश बदलाव चाहता है |
यूपीए 2 में देश कई मुसीबतों से गुज़रा है, या यूँ कहें की गुज़र रहा है, भ्रष्टाचार और महंगाई चरम सीमा पर पहुँच गयी, आलू-प्याज समेत कई खाद्य पदार्थ आम आदमी के बजट से बाहर हो गए, रूपये का अवमूल्यन हुआ, बड़े-बड़े स्कैम्स और घोटाले हुए, जिसका परिणाम था केजरीवाल का आन्दोलन, आन्दोलन का परिणाम था आम आदमी पार्टी और दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद का परिणाम तो आपको पता ही है | मेरे शब्दों से आपको लग रहा होगा की हम आम आदमी पार्टी के समर्थक हैं, पर सच तो ये है की हम किसी भी पार्टी के समर्थक नहीं हैं, हाँ आम आदमी पार्टी के विचारधारा का ज़रूर समर्थन करते हैं | जिस तरह से यह पार्टी आम आदमी के समस्याओं के प्रति गंभीर दिखती है, उससे एक आस ज़रूर बंधती है, और दिल्ली की आम जनता की भी बंधी होगी, तभी तो कांग्रेस 8 सीटों पर सिमट गयी | आप का 28 सीटें ले आना कम से कम मेरे लिए तो हैरानगी भरा नहीं था, पर उन टीवी चैनलों के लिए ज़रूर था जो चुनाव के पहले के एग्जिट पोल में आप के 10 या 12 सीटों पर सिमटने की बातें कह रहे थे |
      आज जब बहुत दिनों बाद 65वीं गणतंत्र दिवस के दो दिन पूर्व ब्लॉग पर लिखने के लिए बैठे हैं तो इस वक़्त न्यूज़ में ओछी राजनीती का ज़िक्र हो रहा है, कोई किसी को एडा कह रहा है, तो कोई आइटम गर्ल | बाकी तो जो है सो हैय्ये है | कुछ दिनों में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं, आशा करते हैं की इस बार देश को मजबूरियों की गठबंधन वाली सरकार नहीं मिलेगी, एक मेजोरिटी वाली सरकार बने, वैसे इस बार बीजेपी के आसार लग रहे हैं, देश ने बहुत से मौके कांग्रेस को दिए |
देश की युवाओं की तरफ से मोदीजी को शुभकामना है | आम आदमी पार्टी भी लोक सभा चुनाव में अपने कैंडिडेट खड़े करने वाली है, उनको भी शुभकामना है | इस बार निश्चित ही आम आदमी पार्टी की सरकार नहीं बनेगी आप भी जानते हैं, लेकिन ऐसी मज़बूत विपक्ष का होना देश के लिए बहुत ही अच्छा होगा |

बहुत लिख लिया, अब सोने जा रहे हैं, आम आदमी की जय हो | आप सबको गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें | जय हिन्द |