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Wednesday, 25 June 2014

परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है |

      लोग कितनी तेज़ी से बदल जाते हैं न, पर शहर इतनी तेज़ी से नहीं बदलता | महानगरों की बात नहीं कर रहे | गाँव और कस्बेनुमा शहरों के बदलने की रफ़्तार थोड़ी आहिस्ता ही होती है | जब लोग बरसों बाद भी महानगरों से अपने छोटे से शहर में, कस्बों में, गाँव में वापस आते हैं जहां उनका बचपन बीता था, वे बड़े हुए थे तो वे पाते हैं की कुछ भी तो नहीं बदला | न उनका वो पुराना दो कमरे का स्कूल बदला, न ही अस्पताल बदले, न सड़कें बदली और न ही बाज़ार बदले | अब भी घर के पास वाले छोटे से मैदान पर कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं | घर के पास में पड़ोस वाले चाचा 3जी युग में भी रेडियो पर हेल्लो फरमाइश सुन रहे हैं | आस-पड़ोस की चाचियाँ अपने घरों के बाहर वाले दीवारों पर गोयठा ठोक रही हैं और पास वाली गली में अब भी वही बूढा पुरानी बोतलों और रद्दियों के बदले सोन पापड़ी के लिए आवाजें दे रहा है, और तो और माँ के संदूक का ताला भी अब तक वही पुराना वाला ही है | क्या अब भी सब कुछ वैसा ही है जैसा वो छोड़कर गए थे, या किसी ने टाइम मशीन से उन्हें पुराने वक़्त में लाकर खड़ा कर दिया है | शहर वैसा का वैसा क्यों है ? शायद वक़्त ठहर गया होगा, या फिर शहरों में हमने बहुत ऊंची उड़ान भर ली है, जहां से पीछे मुड़ कर देखो तो ये सब आउटडेटेड सा लगता है | दरअसल हम अपने सार्वजनिक जीवन में कुछ ऐसे रम जाते हैं की वक़्त का पता ही नहीं चलता | दिन......... महीने ....... साल | और ऐसे में एक युग ही बदल जाता है पर छोटे शहरों में सब कुछ वैसे का वैसा पड़ा मिलता है |


बचपन में हमने किताबों में पढ़ा भी था की “परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है” | पर परिवर्तन और विकास की ये भिन्न चाल हमें और समाज को कुछ सोचने पर मजबूर करती है | अब ज़रा आगे नज़र डालिए | महानगरों में और ऊंची होती बिल्डिंगे, और छोटे शहरों में टूटती स्कूल की छतें | महानगरों में बनते नए-नए फ्लाईओवर और छोटे शहरों में टूटी हुयी सड़कें | महानगरों में बनते नित नए नए स्विमिंग पूल और छोटे शहरों में टूटे हुए छठ पूजा के घाट | महानगरों के कान्वेंट स्कूलों में प्रोजेक्टर और नोटपैड पर होती पढाई और गाँव में भवनहीन स्कूलों में पीपल/ बरगद के पेड़ के नीचे लगती कक्षा | बात छोटे शहरों को मेट्रो का दर्जा दिलाने की नहीं है, बल्कि इन गाँव और छोटे शहरों की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने की है, तभी इन शहरों में रहने वाले बच्चों और युवाओं को एक बेहतर महौल मिलेगा और ये अपनी प्रतिभा अनुरूप देश को आगे ले जा सकेंगे | हमारे देश के राजनेताओं को यह सोचना होगा की कैसे देश के विकास में एकरूपता लाया जाये जिससे इन बच्चों और युवाओं की प्रतिभा कुंठित न होने पाए, बात अच्छे दिनों को लाने की जो है |

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