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Saturday, 12 September 2020

यादों की आलमारी

वर्ष 1998 | कोई एक इतवार का दिन |

और एक छोटे से शहर में इतवार की एक ऊंघती सी सुबह |

90 के दशक के बच्चों को पता है कि उन दिनों इतवार का मतलब आज की तरह बेमतलब नहीं होता था | उन दिनों इतवार को होता था फुल डे सेलीब्रेशन | मुंह अँधेरे बैट बॉल ले के मैदान पहुँच जाना | फिर देर तक क्रिकेट खेलना | इसके बाद घर पहुँच कर दूरदर्शन पर बैक टू बैक जय श्री कृष्णा, कैप्टन व्योम, मालगुडी डेज़, शक्तिमान देखना | 😎😎

दोपहर में दाल, भात, भुजिया और आम का अचार खाकर पंखे के नीचे मस्त एक नींद मारना और फिर शाम को वापस 4 बजे से दूरदर्शन पर परिवार, दोस्तों और पड़ोसियों का एकत्रित होकर हिंदी फीचर फिल्म देखना | फिल्म का हीरो दौड़ते-दौड़ते बड़ा हो ही रहा है कि बत्ती गुल | फिर सब लोगों ने इकट्ठे मिल कर बिजली विभाग के कर्मियों को सप्रेम इज्ज़त से याद किया | 😜😜 फिल्म के बीच के गानों में हीरो हीरोइन के 4 बार कपडे बदलकर डांस करने पर कौतुहल से आपस में डिस्कस करना की ये एक गाने के बीच में 4 बार कपडे कैसे बदल लेते हैं ??
रात में बिजली गुल होने पर लैम्प की रौशनी में स्कूल का होमवर्क जल्दी-जल्दी बनाना ताकि सोमवार को माट्साब लड़कियों से कान ऐंठवाकर थप्पड़ न मरवायें | 😝
महसूस कर पा रहे हैं आप बचपन में बिताये हुए इतवार के एक एक लम्हे को ? 😊😊
हमको अच्छे से पता है की आप सब लोग नौसटैल्जिक हो रहे होंगे | 😇😇 होंगे भी क्यूँ न 90 के दशक के बड़े हो चुके बच्चों का संडे अब सुबह लेट से उठने, मोटरसाइकिल में पेट्रोल भराने, सर्विसिंग कराने और पूरा दिन सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर बिताते हुए निकल जाता है | 😏😏
इनके जीवन में अब क्रिकेट की जगह पब्जी और दुसरे मोबाइल गेमों ने ले ली है | सारे दोस्त अब क्रिकेट के मैदान में नहीं मिलते | व्हाट्सएप्प ग्रुप पर यदा-कदा इनका रीयूनियन होता है | 😐
खाने में बचपन वाली दाल भात भुजिया की जगह संडे स्पेशल खानों ने ले ली है, पर इसके बावजूद खाने के बाद संतुष्टि का भाव कहीं चला गया है | अब सिर्फ पेट भरता है, आत्मा तृप्त नहीं होती |
दूरदर्शन के 4 बजिया हिंदी फीचर फिल्म की जगह मल्टीप्लेक्स के बड़े पर्दों ने ले ली है, जहाँ अब बीच में बत्ती गुल नहीं होती | अब सोफिस्टीकेटेड दर्शक बिना शोर किये सन्नाटे में पूरी फिल्म देख लेते हैं |
अब रात में बिजली नही जाती | जाती भी है तो अब घर-घर में इनवर्टर की सुविधा है, इसलिए अब रात में कोई छत पर खुली हवा में नहीं टहलता | खुली छते इंतज़ार करती रहती हैं, पर अब लोग लैपटॉप और मोबाइल खोलकर उसमे नज़रें गड़ाकर पता नहीं जीवन का कौन सा सार खोजते रहते हैं ||

तो यही है हम सब के बचपन के यादों की आलमारी | इन यादों की आलमारी को खोलते ही अनायास चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान पसर जाती है | है न ?? पर देखिये न !! चेहरे को छूकर ये मुस्कराहट तुरंत लौट भी जाती है, उन पुराने दिनों के कभी न वापस लौट पाने की टीस के साथ | ये यादें ऐसी हैं जैसी किसी ने मुस्कराहट और उदासी का रंग एक साथ चेहरे पर मल दिया हो और और आप इन यादों को भारी मन से पर मुस्कुराकर विदा करते हैं |
जीवन के मशीनी दिनचर्या में कभी-कभी आप भी अपने मन के किसी कोने में छिपी अपने यादों की आलमारी खोलिये, थोड़ी झाड-पोंछ करिए फिर देखिये उस बेशकीमती आलमारी में से छुपे हुए कितनी ही यादें निकलेंगी, जो आपको नौसटैल्जिया से भर देंगी | ये यादें पुरानी होकर भी लगेगी की मानो ये कल की ही तो बात है | 🙂🙂

Saturday, 24 December 2016

यादों का कोहरा


सर्दियों में जल्दी छुप जाने वाली शामें यादों की तहों को कितना उघेरती हैं न ! मानो जैसे हाथों से बुने किसी स्वेटर के एक सिरे में खरोंच लग गयी हो, और उसकी उन परत दर परत खुलती ही जा रही हो।

पता है तुम्हें ..... दिल सुबह से ही तुम्हारी यादों का पिटारा खोल के बैठ जाता है, और दिन भर मुस्कुराते मुस्कुराते शाम को ये किसी रूठे बच्चे की तरह बिलकुल गुमसुम हो जाता है। सर्दियों का मौसम अब मेरा फेवरेट नहीं रहा।  ग़ुलाबी सर्दी भी अब ग़ुलाबी नहीं लगती, यूँ लगता है किसी घटाटोप कोहरे ने जैसे मेरे हिस्से की ग़ुलाबी धूप पर अपना डेरा जमा लिया है। अब तो गर्म चाय भी ईश्क़ में  बर्फ की तरह जम चुके दिल को पिघला नहीं पा रही। तुम्ही कहती थी न ज़्यादा चाय अवॉयड करो। लो देखो ! चाय अब इतनी भी अच्छी नहीं लगती मुझे। ऑफिस में भी टेबल पर पड़ी चाय के कप में से उठते भाप को बस चुपचाप घूरता रहता हूँ।

आजकल तो क्रिसमस 🎄🎄 और न्यू ईयर 🎉🎉🎈🎈का टाइम है, पर देखो न तुम्हारी यादें कैसे कैसे पोस्ट करवा रही है। मेरा दिल भी राहुल गांधी की तरह हो गया है। बिलकुल पप्पू। राहुल गांधी आजकल शायरियाँ कर रहे हैं, और मैं ये पोस्ट।

कल तो क्रिसमस है न !! सुना है कि किसी बर्फ वाले देश फ़िनलैंड में कोई सैंटा 🎅🎅रहता है, जो सबकी विशेज़ पूरी कर देता है। तो मेरी विश क्यूँ पूरी नहीं की उसने !! 🤔 शायद तुमने अपनी क्रिसमस गिफ़्ट में किसी और को मांग लिया था। :)

Saturday, 18 June 2016

एक लड़का

आखिरी जेठ के इस मौसम में हर जगह उमस की चादर लिए एक दुसरे से बिलकुल जुदा जब दिन और रात भी एक हो लिए हैं | वहीँ अपने कमरे में निपट अकेला एक लड़का अपने मन की गहराइयों में जाकर उसके अन्दर उपजे अकेलेपन को किसी से बाँट आने की आरज़ू मिन्नतें करता है | पर उसका मन तैयार भी कैसे हो ! डरता है वह लड़का | डरता है वो लड़का उसकी ओर मुस्कुराते चेहरों के पीछे छुपी कुटिलता के अहसास से, गर्मजोशी से मिलते हाथों के पीछे छुपी झूठी औपचारिकता से, नए परिचय के कुछ नकली लोगों की मतलबियत से | धीरे-धीरे सब समझने लगा है वो |
अपनी छोटी सी उम्र में अपने अन्दर तरह-तरह के खट्टे-मीठे अनुभवों को समेटे उस लड़के का मन धीरे-धीरे थककर अब बहुत डरने लगा है | धीरे-धीरे बड़ा होता उसका शहर, लोगों की बढती भीड़, ऊंचे ओवरब्रिजेज, नए खुलते शौपिंग माल्स उसे उत्साहित नहीं करते, बल्कि डराते हैं | सड़क पर वो लड़का नए-नए चेहरों का मुंह ताकता हुआ चलता है, और अपने मन में उन लोगों के घर से बाहर निकलने के उद्देश्य के बारे में सोचता है | हाँ ये अजीब है | और, ऐसे चेहरों को देखकर उसे अक्सर सिटीलाइट्स मूवी के अरिजीत के गाये गाने की आवाजें पार्श्व संगीत के जैसे अंतर्मन में निरंतर सुनाये देते रहती है- “इतने सारे चेहरे हैं और तनहा सब के सब, तेरे शहर का काम है चलना, यूँ ही बेमतलब” | फिर वो दफ्तर जाते वक़्त पुतले जैसे लोगों और गाड़ियों से ठस चुकी मेन सड़क का रास्ता छोड़ औरों से अलग एक सुनसान गली पकड़ लेता है | उस गली में उसे मिलते हैं कान्हा जी, देवी माँ और बजरंगबली भी तो | तीन मंदिर हैं वहां | वहीँ रोज़ की तरह उसे मंदिर के बगल में नज़रें झुका कर अपने काम में मग्न बादाम मिलाकर भांग पीस रहा दुकानदार मिलता है | और मिलते हैं कुछ लोग, जो दुनिया जहान के पचड़ों से दूर रोज़ वहीँ पीपल के पेड़ के नीचे गोल चबूतरे पर ताश खेलते दिख जाते हैं | थोडा ही आगे पोखर के किनारे एक महादलित टोला भी मिलता है, जिसे देखकर लगता है कि इनकी सुबह ही अभी हुयी है | या सुबह हुयी ही नहीं इनकी कभी ........|  और उसी पोखर के किनारे एक छोर पर फूस से बनी एक झोपडी मिलती है | वहीँ उसे लगभग रोज़ ही दिख जाती है उसी झोपडी में रहने वाली बैसाखियों के सहारे चलती एक बहुत ही खूबसूरत लड़की | लगभग हर रोज़ नज़रें मिलती हैं दोनों की, पर हर बार अजनबियों की तरह ही | इस तरह चलते-चलते धीरे-धीरे वो पहुँच जाता है उस जगह जहां उसके पगलाए मन को कुछ घंटों के लिए आराम मिल जाता है | उसका दफ्तर |
लड़के की शामें भी और दूसरे हमउम्र लड़कों की तरह मलंगी नहीं है | एकाकी जीने की आदत हो गयी है उसे | पर ऐसा हमेशा से नहीं था | जीन जैसा भी कुछ होता है ना शायद ! उसके पिता भी शामों को सबसे अलग बाहर अँधेरे में बिलकुल चुपचाप रेडियो सुना करते थे | लड़के को अजीब लगता था, पर वो कुछ बोलता नहीं था |
लड़का बुरा नहीं है, बस उसे समाज के सो कॉल्ड सोफेस्टीकेटेड पीपल के बीच ठीक से घुलना मिलना नहीं आता | बुरे वक़्त ने उसके आत्मविश्वास को डिगा के रख दिया है | बुरा वक़्त उसका पीछा छोड़ता ही नहीं है ...... ठीक वैसे जैसे कुत्तों का कोई झुण्ड, बोरा लिए कूड़ा बीनने वाले छोटे-छोटे बच्चों का पीछा नहीं छोड़ता | लगभग काट खाने की स्थिति में पीछे-पीछे भौंकते चलता है |

पर कोई ना......... लड़के का दिल भी बहुत जिद्दी है | J

Tuesday, 22 March 2016

सफ़रनामा इश्क़ का

याद है तुम्हें....  हम एक दिन यूँ ही गप्पे लड़ा रहे थे तब मैंने यूँ ही मज़ाक में तुमसे कहा चलो हम लोग मिलके कहीं चाय की टपरी खोलते हैं। मुस्कुराते हुए तुमने भी कह दिया हाँ चलो खोलते हैं। फिर जब मैंने पुछा की अच्छा ये बताओ हमलोग चाय की टपरी का नाम क्या रखेंगे तो तुमने तपाक से कहा........ बंजारों की चाय। मैं कितना जोर से हँसा था। 

फिर से जब उन पलों को याद करता हूँ तो वैसी ही मुस्कराहट मेरे चेहरे पर ऐसे फ़ैल जाती है मानो तुमने अपने हाथों से मेरे दोनों गालों पर चिकोटी काट के कहा हो की “मुस्कुराओ............खुश रहा करो मिस्टर बंजारा” | तुमने कहा था न, कि जब भी मन उदास हो एक चॉकलेट खा लिया करो, दिल खुश हो जाएगा | तो सुनो.....तुम्हारी बात मान ली है मैंने, अब जब भी दिल उदास होता है, तुम्हें याद कर एक चॉकलेट पक्का खा लेता हूँ |

उस समय की बेचैनी........ सुबह साढ़े चार बजे तक का नींद न आना, ये सब मुझे अब भी बहुत डरा देती है | You know तुम्हें पाया भी नहीं था........ और तुम्हे खो देने भर का ख़याल मुझे ऐसे डराता था, जैसे राजस्थान टूरिज्म वाले ऐड में भानगढ़ के किले में दिल्ली का सैलानी वह लड़का डर जाता है। उसकी आंखों में खौंफ देखो। तुम्हें बिना पाए खो देने का डर मुझे बेचैन किये था |

एक दिन तुमने तो कह दिया की मैं तुम्हारी ज़रुरत नहीं हूँ, की मैं नहीं हूँगी तो तुम जी नहीं पाओगे। पर मैं तुम्हे कैसे कहता की तुम मेरी respiratory सिस्टम हो, गर तुम नहीं होगी तो साँस नहीं आएगी मुझे। कैसे वैनिश कर देता इन फीलिंग्स को | तुम्हें पता है ? कि पहला प्यार पहले-पहले विडियो गेम की तरह होता है जिसका मोह छूटे नहीं छूटता |

पर तुम बिलकुल परेशान मत होना.........दसरथ काका (मांझी) कह गए हैं कि “प्रेम में बहुते बल होता है बबुआ।मुझे भी यही लगता है की अंत तक प्रेम करना Is more important. प्रेम को पा लेना प्रेम की पराकाष्ठा नहीं। जीवन की पहली-पहली इन भावनाओं को अपनी यादों में हमेशा सहेजकर रखूँगा मैं, जैसे कोई छोटा बच्चा अपने खिलौनों को सहेजकर रखता है, अपने से दूर जाने नहीं देता |

You know कभी-कभी सोचता हूँ कि क्या करता मैं कि तुम्हें ये यकीन जाता कि मेरी भावनाएँ असली है, इनमें नए ज़माने में अक्सर मिल जानेवाली सस्ती मिलावट नहीं है। कलाई काट लेता अपनी ??? रांझणा में कुंदन ने भी काट ली थी। पर फिर भी ज़ोया कहाँ मिली उसे ?? कुंदन ने ठीक ही कहा था - "हम खून बहाते रहें... तुम आँसू बहाती रहो, साला इश्क़ हुआ... लाठी चार्ज हो गया। 
काश कि तुम होती पास में...... और यूँ होती की और कोई न होता | सुनो न.... एक बार आ के मेरी नज़रों से देखो तो ज़रा | तुम्हारे इश्क में मेरा शहर भी गुलाबी हुआ पड़ा है | तुम्हें पता है....... की मेरे शहर में भी एक झील है, जहां गर्मियों में दूर देश और शहरों के प्रवासी पंछी दिन बिताने आते हैं | तुम भी प्रवासी चिड़िया की तरह उड़ के आ जाओ न...... हम झील के किनारे साथ बैठ कर गर्मी की शामें बिताएंगे | J 
#सफ़रनामा_इश्क़_का




Monday, 21 March 2016

व्याकुल मन का अँधेरा

ऑफिस के कमरे में भीतर बैठे-बैठे यूँ ही जब बाहर की तरफ देखता हूँ तो दिखाई पड़ता है एक सहजन का पेड़ | जिसकी फलियाँ इस साल इतनी सारी हैं कि जिसके भार से पेड़ आधा झुक गया है |
ठीक बगल में दो तार के वृक्ष हैं एकदम सीधे खड़े | जिसके पत्तों से आती सरसराहट की आवाज़ मन मोह लेती है, पर बगल में चलते जनरेटर की शोर मचाती कर्कश आवाज़ अक्सर इनकी आवाजों को दबा देती है | 

कुछ टूटी-फूटी कुर्सियाँ और जंग खायी साईकिलें हैं, जिनकी ज़रुरत शायद अब किसी को नहीं रह गयी हैं |

बाहर गर्मियों की शुरूआती कड़क धुप है, अन्दर मन का अँधेरा है | बाहर सामने की बिल्डिंग में डीएम साहब के जनता दरबार में उमड़ी फरियादियों की भीड़ है, अन्दर भी एक फरियादी है......पर फ़रियाद किससे करे ये उसे पता ही नहीं है | बाहर कोयल की कूक है, अन्दर जनरेटर का शोर और धुंआ है | बाहर सोमवार है, अन्दर पता नहीं कौन सा वार है | बाहर प्रकृति का अपनापन है, अन्दर एमएस वर्ड, एक्सेल और पॉवरपॉइंट में उलझा मन है | बाहर वर्ल्ड टीट्वेंटी की धूम है... होली के रंग हैं, अन्दर गुलज़ार साहब के झक सफ़ेद कुरते के जैसे सफ़ेद हो चला जीवन है | बाहर खुश होते, चहचहाते कुछ परिंदे हैं, अन्दर व्याकुल मन से भरा एक लड़का है |

Tuesday, 10 February 2015

हाँ मैं अनार्किस्ट हूँ !

जी बिलकुल ठीक पढ़ रहे हैं आप, बीजेपी के सबसे बड़े लड़ैया प्रधानमन्त्री मोदी के कथनानुसार जिन्होंने दिल्ली की अपनी रैली में कहा था, क्या आप एक अनार्किस्ट को अपना मुख्यमंत्री चुनेंगे ? इसके ठीक उलट दिल्ली की जनता ने एक अनार्किस्ट को अपना मुख्यमंत्री मान लिया और अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को पांच साल के लिए सरकार चलाने की मांग को स्वीकार कर लिया है | आम आदमी पार्टी 67 सीटों के साथ न केवल दिल्ली विधानसभा चुनावों में विजयी रही है, बल्कि इतने बड़े जनादेश के साथ एक इतिहास भी रच दिया है | बीजेपी मात्र 3 सीटों पर सिमट के रह गयी है इसीलिए शायद उसे विपक्ष का दर्जा भी न मिले | और कांग्रेस का तो खाता भी नहीं खुला, शायद मोदीजी जनधन योजना में कांग्रेस का खाता खुलवाकर दर्द कुछ कम कर सकें |

थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं | तारीख 8 दिसंबर 2013 | आज की ही तरह दिल्ली विधान सभा चुनाव के रुझान आने लगे थे | हम भी टीवी पर लगे हुए थे | लाइव रिपोर्टिंग चल रही थी | जैसे ही आम आदमी पार्टी की किसी सीट के जीतने की खबर आती, आम आदमी पार्टी के कार्यालय के बालकनी में खड़े केजरीवाल, कुमार विश्वास आदि नेता और कार्यालय के बाहर खडी जनता में ख़ुशी की लहर दौड़ जाती, और जनता ख़ुशी से झूमने, नाचने लगती | तमाम सर्वे को धता बताते हुए आप 28 सीटें ले आई | वह जीत अप्रत्याशित थी, लेकिन यह नहीं है | लगभग 1 साल बाद आज भी वही नज़ारा है | पटेलनगर के पार्टी कार्यालय के बालकनी में खड़े कुमार विश्वास, संजय सिंह, आशुतोष आदि नेताओं के चेहरे पर वही ख़ुशी के भाव हैं, और इस बार तो ज्यादा ही क्योंकि जनता ने उन्हें स्पष्ट बहुमत दे दिया है, और अल्पमत की सरकार की मजबूरियां अब नहीं रही |
बीजेपी की हार की वजहों पर बहुत लोग बहुत कुछ लिख रहे होंगे, पर मेरे दृष्टिकोण से भारतीय जनता पार्टी की हार की 5 प्रमुख वजहें हैं | गौर कीजियेगा |

1. लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद दिल्ली विधानसभा का चुनाव न कराना |

लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद चुनाव न कराने की वजह से केजरीवाल को लगभग 10 महीनो का बड़ा वक़्त मिल गया | इन 10 महीनो में अरविन्द ने घर-घर जाकर, कैम्पेन कर अपनी पार्टी को फिर से मज़बूत कर लिया, एक तरह से कहिये की आप ने डैमेज कंट्रोल कर लिया | साथ ही अरविन्द केजरीवाल ने अपने इस्तीफ़ा देने पर हर एक चुनावी सभा में सार्वजनिक रूप से माफ़ी भी मांगी | इससे वह जनता भी फिर से आप के साथ हो गयी, जो कहीं न कहीं केजरीवाल के इस्तीफ़ा देने पर उनसे नाराज़ थी |

2. बीजेपी का बड़े लोगों की पार्टी दिखना

आप मानिए न मानिए बीजेपी लोकसभा चुनावों की जीत के बाद बड़े लोगों की पार्टी दिख रही है | छोटे-छोटे मुद्दे गौण हो चुके हैं | ज़मीन हकीकत से इतर बड़ी-बड़ी बातें होती हैं, हमारे प्रधानसेवक की इसमें मास्टरी है | बुलेट ट्रेन की बात की जाती है, स्मार्ट सिटी, वर्ल्ड क्लास सिटी की बात की जाती है, जबकि हमारी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ही मूलभूत सुविधाओं जैसे बिजली, पानी, शौचालय इत्यादि समस्याएँ है | बीजेपी इन सब चीज़ों को नहीं समझ पायी की जनता सिर्फ एक साधारण सा शहर चाहती है, जिसमे उसके मूलभूत सुविधाओं के मिलने में कोई दिक्कत न हो सके | जनता की इसी नब्ज़ को अरविन्द केजरीवाल ने पहचाना |  इससे तमाम मिडिल क्लास, अपर मिडिल क्लास, और निचले तबके के लोग आप के साथ हो लिए |

3. प्रधान सेवक का केजरीवाल पर नेगेटिव हमला

आप लोगों को वो मोदीजी के दिल्ली रैली का वो दृश्य तो याद ही होगा, जिसमे हमारे पीएम साहब केजरीवाल पर यह कहकर प्रहार कर रहे हैं की अगर आप अनार्किस्ट हैं, तो जंगल चले जाइये | नक्सलियों के साथ रहिये | और बगल में बैठे अमित शाह और सतीश उपाध्याय मोदीजी के इस बयान पर हंस रहे हैं | यही नहीं पूरी बीजेपी पार्टी केजरीवाल पर लगातार व्यक्तिगत हमले करती रही | लगातार उन्हें भगोड़ा, बन्दर, नक्सली, उपद्रवी, धोखेबाज़, खांसने वाले कहती रही | इससे बीजेपी के प्रति गलत सन्देश जनता में गयी |

4. आम आदमी पार्टी के पास जेन्युइन नेताओं और कार्यकर्ताओं की फौज

यह एक बहुत बड़ी वजह रही आम आदमी पार्टी के चुनाव जीतने की | लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद ही आम आदमी पार्टी के सभी कार्यकर्ता और नेता अपने इस महामिशन पर लग गए थे, और इसके उलट बीजेपी का लोकसभा चुनावों में जीत का हैंगओवर अभी तक उतरा नहीं था | आम आदमी पार्टी के सभी कार्यकर्ता बिना किसी शोर-शराबे के चुपचाप अपने काम में लग गए | घर-घर जाकर अपनी पार्टी के लिए कैमपेन किया | एक बार नहीं 3-3, 4-4 बार लोगों के घरों में जाकर अपनी पार्टी के एजेंडे बताये, उन्हें कन्विंस किया | अगर ऐसा कहें की आम आदमी पार्टी अपने समर्पित कार्यकर्ताओं के वजह से ही चुनाव जीती है, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी | सभी पार्टियों को भी मालूम है की ऐसे समर्पित कार्यकर्ता पैसे देकर खरीदे नहीं जाते |

5. केजरीवाल की ईमानदार छवि

अरविन्द केजरीवाल की इमानदार छवि भी जीत का एक प्रमुख कारण रही | 67 सीटें ले आना यह बताता है की जनता किस कदर अरविन्द पर मोहित हो चुकी थी | मन ही मन उन्हें ये मफलर ओढ़े, खांसने वाला सीधा-सादा आम आदमी अपने नायक के रूप में पसंद आ गया था | बीजेपी के उलट अरविन्द ने नेगेटिव राजनीति नहीं की | अपने एजेंडों को जनता को समझाया, एक नयी तरह की राजनीती की शुरुआत अरविन्द ने की है |  इसलिए पूरी दिल्ली ने मुख्यमंत्री के रूप में उनके नाम की मुहर लगा दी |

आम आदमी पार्टी के लिए हैप्पी एंडिंग यही नहीं होगा, जनता ने उनपर इतना प्यार जो लुटाया है, इतना बड़ा जनादेश जो दिया है, उसका क़र्ज़ जनता को किये वादों को पूरा करके अरविन्द को चुकाना होगा | आम आदमी पार्टी की जीत सिर्फ दिल्ली की जीत नहीं बल्कि आने वाले समय में एक नयी तरह की राजनीती की सुगबुगाहट भी है | खैर आने वाले वक़्त में देखना होगा की क्या एक स्वच्छ और स्वस्थ राजनीती का पदार्पण दिल्ली से भारत की राजनीती में हो चूका है ? शुभ प्रभात |


Monday, 22 December 2014

बिहार विधानसभा चुनाव में अबकी बार किसकी सरकार ?

      विधानसभा चुनावों का सीजन है | जम्मू कश्मीर और झारखण्ड में सभी चरणों में चुनाव समाप्त हो चुके हैं | चुनावों के परिणाम कल आने हैं | बिहार के बहुप्रतीक्षित चुनाव में अभी कुछ समय बाकी है | जम्मू कश्मीर और झारखंड में हो चुके चुनावों के परिणामों का इंतज़ार तमाम राजनीतिक दिग्गज खासकर भाजपा के नेतागण ठीक स्कूल के उन टौपर बच्चों की तरह कर रहे हैं जो अपने आने वाले रिजल्ट के अच्छे परिणामों को लेकर आशान्वित होते हैं | मोदी लहर का तो पता नहीं पर दिसम्बर के इस सर्द महीने में समूचा उत्तर भारत शीत लहर की चपेट में है, लेकिन देश का राजनीतिक माहौल खासकर विधानसभा चुनावों वाले राज्यों जैसे झारखण्ड और बिहार में इस वक़्त काफी गरम है | तमाम राजनीतिक दलों और संगठनों के बड़े नेताओं से लेकर चिरकुट नेता (छुटभैया नेता) आपको पार्टी कार्यालय में राजनीतिक बहसबाजी करते मिल जायेंगे | कुछ भी हो केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद राज्यों में हो रहे या हो चुके विधानसभा चुनावों में भाजपा का पलड़ा थोडा भारी ही है | महाराष्ट्र विधानसभा और हरियाणा विधान सभा चुनाव के नतीजे इसके ताज़ा उदाहरण हैं | हो भी क्यों ना मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की केंद्र में बन चुकी बहुमत वाली सरकार ने राज्यों में मृतप्राय भाजपा संगठनों में प्राण फूँक दिए हैं | राज्यों में लम्बे समय से क्षेत्रीय पार्टियों के वर्चस्व को देखते हुए राज्यों में भाजपा की सफलता कुछ सोचने पर मजबूर करती है | क्या इन राज्यों के लोग क्षेत्रीय पार्टियों द्वारा किये गए वायदों और आश्वासनों तथा परिवारवाद की राजनीती से उकता गए हैं या फिर देश की राजनीती एक नयी ऐतिहासिक दिशा में जा रही है, जिसके गवाह इस पीढ़ी के हम सभी लोग होंगे | बहुत दूर ले के चले गए आपको, थोडा नीचे आ जाइए, बिहार की वर्तमान राजनीती पर कुछ प्रकाश डालते हैं |


     
कभी एक दुसरे के धुर विरोधी रहे नितीश और लालू लोकसभा चुनाव में चोट खाकर अब एक हो चुके हैं | सिर्फ नितीश की जदयु और लालू की आरजेडी ही नहीं कई क्षेत्रीय दल एकजुट हो चुके हैं, एचडी देवेगौडा भी हैं साथ में और इनके अगुआ हैं मुलायम सिंह यादव | मोदीजी ने सच ही कहा था गठबंधन कर के दिल्ली में सरकार बनायीं जाती है, लेकिन अब विपक्ष के लिए पार्टियों को गठबन्धन करना पड़ेगा | बात सही साबित हुयी | आज दिल्ली के जंतर मंतर पर जनता परिवार का विशाल महाधरना हुआ है | सारे दिग्गज जुटे हैं लालू यादव, नितीश कुमार, शरद यादव, मुलायम सिंह यादव, एचडी देवेगौडा | वो कहते हैं न अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता, भाड़ फोड़ने के लिए चने जुड़ रहे हैं | मुद्दे से फिर भटक गए हैं, आइये फिर से बिहार पर आते हैं |


      लोकसभा चुनाव में नितीश कुमार की हार पर बिहार के लोग कहते पाए जाते हैं की इन्होने सिर्फ अति पिछड़ों और महादलितों की राजनीती की हैं, और यही इनकी हार का प्रमुख कारण बना हैं | क्या सच में जातिवाद बिहार की राजनीती पर हावी है ? क्या यहाँ के लोग इस बार के विधानसभा चुनाव में इससे ऊपर उठकर वोट देंगे ? तो जवाब है, नहीं | यहाँ की राजनीती में अभी बहुत वक़्त है | ऐसा नहीं की सिर्फ सुशासन बाबू (नितीश कुमार) और सेकुलर बाबू (लालू यादव) ही जातिवाद की राजनीती करते हैं, भाजपा ने भी लोकसभा चुनावों में इसका फायदा उठाया है | अगर ऐसा नहीं होता तो पासवानजी की लोजपा को भाजपा गठबंधन में शामिल नहीं किया जाता | बहुत ही स्पष्ट है की चुनावों में जीत के कई पैंतरें हैं और जातिवाद की राजनीति पहले नंबर पर है | पर क्या जातिवाद की राजनीती पर ही चुनाव जीते जाते हैं ? राष्ट्रीय परिदृश्य पर देखें और लोकसभा चुनावों में भाजपा की जीत का अवलोकन करें तो पायेंगे की भाजपा की जीत के कई फैक्टर हैं उनमे प्रमुख हैं जनमत बनाने में सोशल मीडिया की भूमिका, संगठन शक्ति और अच्छे प्रवक्ताओं की फौज | जेडीयू और आरजेडी के पास इनकी घोर कमी है | ऐसा नहीं है नितीश ने बिहार में काम नहीं किया है | लेकिन उनके किये कामों को नारों में बदलने के लिए एक कुशल टीम की आवश्यकता है जो की फिलवक्त जेडीयू के पास नहीं हैं | सच बात यही है की नितीश अपने सुशासन को नहीं बेच पा रहे हैं, क्योंकि कहाँ हैं वो बड़े बड़े होर्डिंग जो की नितीश के सुशासन के दावों को सच साबित करें | और नितीश अभी तक सिर्फ फेसबुक पर ही अपने मन की बात कहते आये हैं, उनका अभी ट्विटर, इन्स्टाग्राम जैसे सोशल साइट्स पर आना बाकी हैं |
      ऐसे में नए साल में होने वाले बिहार विधान सभा चुनावों में भाजपा की सरकार बनेगी या महागठबंधन की ये तो आने वाले समय में पता चल ही जायेगा, दोनों के बीच कड़ी टक्कर होनी है| महागठबंधन तथा भाजपा के समर्थक दोनों अपने अपने जीत के दावे कर रहे हैं | ऐसे में सिर्फ यही कहेंगे की कम से कम बिहार की राजनीती में अंदाज़े लगाने बंद कर दीजिये, क्योंकि पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त |