ऑफिस के कमरे में भीतर बैठे-बैठे यूँ ही जब बाहर की तरफ देखता हूँ तो दिखाई पड़ता है एक सहजन का पेड़ | जिसकी फलियाँ इस साल इतनी सारी हैं कि जिसके भार से पेड़ आधा झुक गया है |
ठीक बगल में दो तार के वृक्ष हैं एकदम सीधे खड़े | जिसके पत्तों से आती सरसराहट की आवाज़ मन मोह लेती है, पर बगल में चलते जनरेटर की शोर मचाती कर्कश आवाज़ अक्सर इनकी आवाजों को दबा देती है |
कुछ टूटी-फूटी कुर्सियाँ और जंग खायी साईकिलें हैं, जिनकी ज़रुरत शायद अब किसी को नहीं रह गयी हैं |
बाहर गर्मियों की शुरूआती कड़क धुप है, अन्दर मन का अँधेरा है | बाहर सामने की बिल्डिंग में डीएम साहब के जनता दरबार में उमड़ी फरियादियों की भीड़ है, अन्दर भी एक फरियादी है......पर फ़रियाद किससे करे ये उसे पता ही नहीं है | बाहर कोयल की कूक है, अन्दर जनरेटर का शोर और धुंआ है | बाहर सोमवार है, अन्दर पता नहीं कौन सा वार है | बाहर प्रकृति का अपनापन है, अन्दर एमएस वर्ड, एक्सेल और पॉवरपॉइंट में उलझा मन है | बाहर वर्ल्ड टीट्वेंटी की धूम है... होली के रंग हैं, अन्दर गुलज़ार साहब के झक सफ़ेद कुरते के जैसे सफ़ेद हो चला जीवन है | बाहर खुश होते, चहचहाते कुछ परिंदे हैं, अन्दर व्याकुल मन से भरा एक लड़का है |
No comments:
Post a Comment