वर्ष 1998 | कोई एक इतवार का दिन |
और एक छोटे से शहर में इतवार की एक ऊंघती सी सुबह |
90 के दशक के बच्चों को पता है कि उन दिनों इतवार का मतलब आज की तरह बेमतलब नहीं होता था | उन दिनों इतवार को होता था फुल डे सेलीब्रेशन | मुंह अँधेरे बैट बॉल ले के मैदान पहुँच जाना | फिर देर तक क्रिकेट खेलना | इसके बाद घर पहुँच कर दूरदर्शन पर बैक टू बैक जय श्री कृष्णा, कैप्टन व्योम, मालगुडी डेज़, शक्तिमान देखना | 😎😎
दोपहर में दाल, भात, भुजिया और आम का अचार खाकर पंखे के नीचे मस्त एक नींद मारना और फिर शाम को वापस 4 बजे से दूरदर्शन पर परिवार, दोस्तों और पड़ोसियों का एकत्रित होकर हिंदी फीचर फिल्म देखना | फिल्म का हीरो दौड़ते-दौड़ते बड़ा हो ही रहा है कि बत्ती गुल | फिर सब लोगों ने इकट्ठे मिल कर बिजली विभाग के कर्मियों को सप्रेम इज्ज़त से याद किया | 😜😜 फिल्म के बीच के गानों में हीरो हीरोइन के 4 बार कपडे बदलकर डांस करने पर कौतुहल से आपस में डिस्कस करना की ये एक गाने के बीच में 4 बार कपडे कैसे बदल लेते हैं ??
रात में बिजली गुल होने पर लैम्प की रौशनी में स्कूल का होमवर्क जल्दी-जल्दी बनाना ताकि सोमवार को माट्साब लड़कियों से कान ऐंठवाकर थप्पड़ न मरवायें | 😝
महसूस कर पा रहे हैं आप बचपन में बिताये हुए इतवार के एक एक लम्हे को ? 😊😊
हमको अच्छे से पता है की आप सब लोग नौसटैल्जिक हो रहे होंगे | 😇😇 होंगे भी क्यूँ न 90 के दशक के बड़े हो चुके बच्चों का संडे अब सुबह लेट से उठने, मोटरसाइकिल में पेट्रोल भराने, सर्विसिंग कराने और पूरा दिन सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर बिताते हुए निकल जाता है | 😏😏
इनके जीवन में अब क्रिकेट की जगह पब्जी और दुसरे मोबाइल गेमों ने ले ली है | सारे दोस्त अब क्रिकेट के मैदान में नहीं मिलते | व्हाट्सएप्प ग्रुप पर यदा-कदा इनका रीयूनियन होता है | 😐
खाने में बचपन वाली दाल भात भुजिया की जगह संडे स्पेशल खानों ने ले ली है, पर इसके बावजूद खाने के बाद संतुष्टि का भाव कहीं चला गया है | अब सिर्फ पेट भरता है, आत्मा तृप्त नहीं होती |
दूरदर्शन के 4 बजिया हिंदी फीचर फिल्म की जगह मल्टीप्लेक्स के बड़े पर्दों ने ले ली है, जहाँ अब बीच में बत्ती गुल नहीं होती | अब सोफिस्टीकेटेड दर्शक बिना शोर किये सन्नाटे में पूरी फिल्म देख लेते हैं |
अब रात में बिजली नही जाती | जाती भी है तो अब घर-घर में इनवर्टर की सुविधा है, इसलिए अब रात में कोई छत पर खुली हवा में नहीं टहलता | खुली छते इंतज़ार करती रहती हैं, पर अब लोग लैपटॉप और मोबाइल खोलकर उसमे नज़रें गड़ाकर पता नहीं जीवन का कौन सा सार खोजते रहते हैं ||
तो यही है हम सब के बचपन के यादों की आलमारी | इन यादों की आलमारी को खोलते ही अनायास चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान पसर जाती है | है न ?? पर देखिये न !! चेहरे को छूकर ये मुस्कराहट तुरंत लौट भी जाती है, उन पुराने दिनों के कभी न वापस लौट पाने की टीस के साथ | ये यादें ऐसी हैं जैसी किसी ने मुस्कराहट और उदासी का रंग एक साथ चेहरे पर मल दिया हो और और आप इन यादों को भारी मन से पर मुस्कुराकर विदा करते हैं |
जीवन के मशीनी दिनचर्या में कभी-कभी आप भी अपने मन के किसी कोने में छिपी अपने यादों की आलमारी खोलिये, थोड़ी झाड-पोंछ करिए फिर देखिये उस बेशकीमती आलमारी में से छुपे हुए कितनी ही यादें निकलेंगी, जो आपको नौसटैल्जिया से भर देंगी | ये यादें पुरानी होकर भी लगेगी की मानो ये कल की ही तो बात है | 🙂🙂