मुंबई ! सपनों का शहर | हा हाहा | थोडा ललित
निबंध टाइप हो गया न ? पर सच है रोजाना हजारों-लाखों लोग कुछ बनने का ख्वाब लेकर
यहाँ आते हैं | सपने दिखाती है ये शहर, कुछ के पूरे करती है, और कुछ इन सपनों में
ही समा जाते हैं | मुंबई की लाइफलाइन कहते है यहाँ के लोकल ट्रेन को | मुंबई की
लोकल में रोजाना बहुत ही ज्यादा भीड़ होती है, राजनीतिक शब्द में कहना चाहें तो
अपार जनसैलाब कह सकते हैं | स्टेशन पर आप कहीं रूककर ज़रा लोगों को देखिये तो दिखता
है की लोग कान में ठिप्पी (ईयर फ़ोन) लगाए पागलों की तरह उन्माद में भागते नज़र आते
हैं | पर इसी बीच यह अहसास होता है की हम क्यों रुक कर लोगों को देख रहे हैं यहाँ
पर | लोगों के भागते होने के बीच खुद का रुकना जो आत्मबोध कराता है वो रोंगटे खड़े
कर देने वाला होता है | ऐसा लगता की कोई रेस चल रही हो और अगर हम कुछ देर रुके तो कहीं
पीछे छूट जायेंगे | पर एक बात ज़रूर है की कन्धों पर बैग लटकाए और कान में इयर फ़ोन
लगाए इन लोगों को जीवटता को सलाम करने का दिल भी करता है की कैसे ये कर पाते हैं ? रोज़
वही भागकर लोकल पकड़ना, पसीने से नहाए खड़े-खड़े सफ़र करना, खड़े-खड़े ही झपकी मार लेना,
सुबह घर से जल्दी निकलना, और देर से लौटना, और मुंबई के ट्रैफिक और शोर में जीना |
पर इस आपाधापी से दूर मुंबई में कई ऐसी जगहें हैं जो आपके मन को मोह लेती हैं जैसे
जुहू बीच, मरीन ड्राइव और गेट वे औफ इंडिया |
मुंबई की पागल करती भीड़, ट्रैफिक जाम से दूर जब आप गेट वे ऑफ़ इंडिया के पास आते हैं जिसके बिलकुल सामने होटल ताज है तो इनको देखते ही मन एकाएक खिल उठता है, ठीक वैसे ही जैसे रूसे हुए बच्चे को किसी ने उसके मनपसंद का खिलौना दे दिया हो | गेट वे ऑफ़ इंडिया के आस पास लहराता हुआ समंदर उस माँ की तरह लगने लगता है जो कहीं दूर बैठी अपनी यादों में अब भी हमारा माथा सहला रही है | हौले हौले | प्यार से | समंदर से उठती ठंढी सी हवाएं माँ की उन मासूम थपकियों सी लगती हैं, जो न जाने कब से नसीब नहीं हुयी | जो दूरियों में कहीं गुम हो गयी |
मुंबई की पागल करती भीड़, ट्रैफिक जाम से दूर जब आप गेट वे ऑफ़ इंडिया के पास आते हैं जिसके बिलकुल सामने होटल ताज है तो इनको देखते ही मन एकाएक खिल उठता है, ठीक वैसे ही जैसे रूसे हुए बच्चे को किसी ने उसके मनपसंद का खिलौना दे दिया हो | गेट वे ऑफ़ इंडिया के आस पास लहराता हुआ समंदर उस माँ की तरह लगने लगता है जो कहीं दूर बैठी अपनी यादों में अब भी हमारा माथा सहला रही है | हौले हौले | प्यार से | समंदर से उठती ठंढी सी हवाएं माँ की उन मासूम थपकियों सी लगती हैं, जो न जाने कब से नसीब नहीं हुयी | जो दूरियों में कहीं गुम हो गयी |
अथाह सा समंदर उतावले से शहर को अपनी लहरों के
बीच कहीं गुम कर देता है जैसे भागते हुए किसी शैतान से बच्चे को माँ ने पकड़कर अपनी
आँचल में छुपा लिया हो |
और इस तरह आप चाहे अनचाहे मुंबई से प्यार करने
लगते हैं |


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